प्राचीन काल से ही हिमालय भारतीय सभ्यता की सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक और आध्यात्मिक चेतना का एक प्रमुख केंद्र रहा है। यह विराट भू-प्रदेश केवल पर्वत-श्रृंखलाओं का विस्तार नहीं बल्कि ज्ञान, तप और साधना की वह अक्षुण्ण धारा है, जिसने असंख्य मनीषियों, चिंतकों, शोधकर्ताओं और सृजनशील लेखकों को दिशा दी है। हिमालय भारतीय आत्मा का जीवंत प्रतीक है जहाँ प्रकृति और दर्शन, साधना और संवेदना परस्पर एक-दूसरे में विलीन हो जाते हैं।
जब-जब हिमालयी अंचल किसी आपदा, संकट या त्रासदी के साये में आया है, तब संवेदनशील रचनाकारों की लेखनी मौन नहीं रही। ऐसे समय में साहित्य केवल सौंदर्य-बोध का साधन नहीं बल्कि प्रतिरोध, आत्ममंथन और सामूहिक चेतना की मुखर अभिव्यक्ति बनकर सामने आया है। इसी परंपरा के सजग संवाहक हैं लेखक हितेन्द्र शर्मा, जिनके शब्दों में संघर्ष की पीड़ा के साथ-साथ सामाजिक उत्तरदायित्व की स्पष्ट चेतना भी निहित है।
हिमालय की शांत ऊँचाइयों के बीच जब कोई मनुष्य अपने भीतर की आवाज़ सुनने का साहस करता है, तब वह केवल प्रकृति का साक्षात्कार नहीं करता बल्कि जीवन के गहन अर्थों को स्पर्श करता है। हितेन्द्र शर्मा ऐसे ही एक शब्द-साधक हैं। एक ऐसे रचनाकार, जिनकी लेखनी में हिमाचल की मिट्टी की सादगी, भारतीय संस्कृति की गहराई और जीवन-दर्शन की उदात्तता एक साथ प्रवाहित होती है। वे कवि, लेखक, पत्रकार और डिजिटल सृजनकर्ता हैं, किंतु इन सभी पहचानों से पहले एक सजग भारतीय नागरिक हैं, जो अपने शब्दों के माध्यम से संस्कृति, संवाद और संवेदना के सशक्त सेतु निर्मित करते हैं।
19 मई 1980 को हिमाचल प्रदेश के शिमला जनपद की तहसील कुमारसैन के रमणीय गाँव किंगल में जन्मे हितेन्द्र शर्मा को सृजनशीलता विरासत में प्राप्त हुई। उनके पिता स्वर्गीय श्री चन्द्र मोहन शर्मा समाजसेवा और नैतिक मूल्यों के प्रतीक थे, जिन्होंने उन्हें कर्मनिष्ठा और सामाजिक उत्तरदायित्व का संस्कार दिया। माता स्वर्गीय श्रीमती प्रमिला शर्मा की ममता और संवेदनशील दृष्टि ने उनके व्यक्तित्व में करुणा, विनम्रता और रचनात्मकता के बीज रोपे। यही कारण है कि उनकी रचनाओं में भावनात्मक गहराई और सामाजिक सरोकार समान रूप से प्रतिबिंबित होते हैं।
तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने के उपरांत भी उनका मन साहित्य और संस्कृति की भूमि में ही रमा रहा। उन्होंने सूचना प्रौद्योगिकी और सृजनशीलता का एक अनूठा संगम रचा। परिणामस्वरूप वे आज केवल कवि या लेखक ही नहीं बल्कि एक प्रभावशाली डिजिटल सृजनकर्ता के रूप में भी अपनी सशक्त पहचान स्थापित कर चुके हैं। उनके लिए लेखन आत्म-संवाद की साधना है जहाँ शब्दों से संवेदना जन्म लेती है और संवेदना से संस्कृति का विस्तार होता है।
आकाशवाणी और दूरदर्शन शिमला के माध्यम से उनकी कविताओं और विचारात्मक वार्ताओं का प्रसारण हुआ है, जिसने उनकी रचनात्मक पहचान को व्यापक श्रोता-वर्ग तक पहुँचाया। कवि और साहित्यकार के रूप में उनकी प्रथम प्रकाशित पुस्तक ‘संवाद’ उनके रचनात्मक जीवन का सजीव दर्पण है। यह संग्रह कवि के अंतर्मन और समाज के बीच एक संवेदनशील सेतु निर्मित करता है। ‘संवाद’ केवल एक शीर्षक नहीं बल्कि उनके जीवन-दर्शन की अभिव्यक्ति है जो मौन को भी वाणी देता है।
इस काव्य-संग्रह पर जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) नई दिल्ली के प्रोफेसर डॉ. कृष्ण मोहन पाण्डेय ने लिखा है कि ‘संवाद’ जीवन के उन अनकहे अनुभवों का संकलन है, जो मनुष्य के भीतर निरंतर घटित होते रहते हैं। हितेन्द्र शर्मा का कवि-मन समाज, संवेदना और आत्म-संवाद के बीच निरंतर यात्रा करता प्रतीत होता है।
‘संवाद’ की कविताएँ मानवीय भावनाओं की विविधता को छूती है। इन कविताओं में कहीं माँ की ममता है, कहीं बेटी की संवेदना; कहीं प्रकृति का संगीत है, तो कहीं समाज की कठोरता पर करुणा का मौन प्रतिवाद। कवि का मन प्रेम, पीड़ा, स्मृति और संघर्ष सभी का साक्षी है। कवि लोक की धरती से जुड़ा हुआ होते हुए भी जीवन के दार्शनिक आयामों को स्पर्श करता है।’
उनकी विचारात्मक वार्ताएँ दूरदर्शन हिमाचल के लोकप्रिय कार्यक्रम ‘वाग्धारा’ में तथा रचनाएँ आकाशवाणी शिमला के ‘साहित्य दर्पण’ में अनेक बार प्रसारित हुई हैं। किंतु उनका सबसे उल्लेखनीय और दीर्घकालिक योगदान ‘साहित्य कला संवाद’ के रूप में सामने आता है। एक ऐसी सांस्कृतिक धारा, जिसे उन्होंने हिमाचल प्रदेश कला, संस्कृति और भाषा अकादमी के लिए संपादित-प्रस्तुत कर एक सशक्त सांस्कृतिक आंदोलन का स्वरूप प्रदान किया।
कोरोना काल जैसी अभूतपूर्व चुनौती के दौरान ‘साहित्य कला संवाद’ के माध्यम से उन्होंने प्रांतीय और राष्ट्रीय स्तर के प्रतिष्ठित साहित्यकारों, कलाकारों और विचारकों से निरंतर संवाद स्थापित किया। प्रतिदिन लाइव प्रसारण करते हुए लगभग 772 कार्यक्रमों का आयोजन करना केवल एक कीर्तिमान नहीं बल्कि उनकी अनुशासित सृजनशीलता, सांस्कृतिक प्रतिबद्धता और अथक श्रम का प्रमाण है।
इसी कालखंड में हिमाचल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण हेतु लघु फिल्मों के माध्यम से महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक डॉक्यूमेंटेशन भी किया गया। फेसबुक और यूट्यूब जैसे डिजिटल मंचों पर प्रसारित ये कार्यक्रम साहित्यिक गोष्ठियों, साक्षात्कारों और संवादों के माध्यम से जन-संस्कृति के सशक्त अभिलेख बन गए। इतने एपिसोड का सृजन और प्रसारण केवल एक सांख्यिक उपलब्धि नहीं बल्कि हितेन्द्र शर्मा की सतत सृजनशीलता, अनुशासन और सांस्कृतिक प्रतिबद्धता का जीवंत प्रमाण है।
पत्रकारिता के क्षेत्र में भी हितेन्द्र शर्मा एक विवेकशील और संतुलित लेखक के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने हिमाचल दस्तक, अनंत ज्ञान, प्रचंड समय, साप्ताहिक गिरिराज, हिमप्रस्थ और मातृवंदना जैसी पत्रिकाओं में 400 से अधिक स्तंभ लेख लिखे हैं। उनके लेख सामाजिक, सांस्कृतिक और शैक्षिक विषयों पर गहन दृष्टि प्रस्तुत करते हैं। वे किसी विचारधारा के प्रचारक नहीं बल्कि सत्य के साधक हैं।
आधुनिक तकनीकी युग में, जहाँ साहित्य और लोक-संस्कृति के बीच की दूरी निरंतर बढ़ती जा रही है, वहाँ हितेन्द्र शर्मा ने दोनों को जोड़ने का सार्थक कार्य किया है। उन्होंने भारतीय सभ्यता की प्राचीन मूल लिपि ब्राह्मी तथा हिमाचल की ऐतिहासिक पहचान से जुड़ी टांकरी लिपि का विधिवत अध्ययन किया है। वर्तमान में वे हिम संस्कृति शोध संस्थान के उपाध्यक्ष के रूप में टांकरी लिपि के प्रशिक्षण, संरक्षण और प्रचार-प्रसार हेतु सक्रिय रूप से कार्यरत हैं। यह कार्य केवल एक दायित्व नहीं बल्कि उनकी गहरी सांस्कृतिक साधना और विरासत-बोध का सशक्त प्रमाण है।
उनके साहित्यिक और सांस्कृतिक योगदान को अनेक सम्मानों से सम्मानित किया गया है जिनमें राज्य स्तरीय शंखनाद मीडिया विशिष्ट सम्मान (2022), मातृवंदना संस्थान लेखक सम्मान (2023) तथा हिमाचल प्रदेश कला, संस्कृति और भाषा अकादमी की स्थायी समिति की सदस्यता प्रमुख है।
वर्तमान में वे “हिमालयन डिजिटल मीडिया” के संपादक के रूप में भी सक्रिय हैं, जो हिमाचल की लोक-संस्कृति, कला और नीति-विमर्श को डिजिटल युग की संवेदनशील भाषा प्रदान करता है। यह मंच पारंपरिक पत्रकारिता और सांस्कृतिक चेतना का संगम है, जहाँ शब्द केवल समाचार नहीं बल्कि विचार बनते हैं।
हितेन्द्र शर्मा का जीवन भारतीय ज्ञान-परंपरा के उस शाश्वत सूत्र का सजीव उदाहरण है “विद्या ददाति विनयं, विनयाद् याति पात्रताम्।” उनके लेखन में न प्रसिद्धि का आग्रह है, न पुरस्कार की लालसा केवल समाज, संस्कृति और सत्य के प्रति निष्ठावान समर्पण है।
आज जब साहित्य बाज़ारीकरण के दबाव में अपनी संवेदना खोता जा रहा है तब हितेन्द्र शर्मा जैसे रचनाकार उस परंपरा के प्रहरी हैं, जो हमें हमारी जड़ों की ओर लौटने का मार्ग दिखाते हैं। उनके शब्द हिमालय की निस्तब्धता जैसे हैं धीमे, गहरे और अडिग।
उनकी रचनाओं में हिमालय की शीतलता, लोकगीतों की लय, माँ की ममता और संस्कृति की आत्मा का उजास समाहित है। वे केवल कवि या लेखक नहीं बल्कि हिमालय की आत्मा के शब्द-साधक हैं जो समय के कोलाहल के बीच भी संस्कृति की मौन ध्वनि को सुनने और उसे शब्द देने की दुर्लभ क्षमता रखते हैं।
हितेन्द्र शर्मा हिमाचल प्रदेश के समकालीन लेखकों, कवियों और समीक्षकों में एक स्थापित एवं लोकप्रिय हस्ताक्षर हैं। उन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से सामाजिक, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय सरोकारों को निरंतर अपने सृजन का केंद्र बनाया है। पुस्तक-सृजन, पत्रकारिता और सोशल मीडिया जैसे विविध माध्यमों के माध्यम से उन्होंने अपनी विशिष्ट पहचान स्थापित की है और वर्तमान समय में भी निरंतर सृजनरत हैं।
✍️ डाॅ. कर्म सिंह
पूर्व सचिव
हिमाचल कला संस्कृति भाषा अकादमी
हिमाचल प्रदेश सरकार


